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अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
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महेश्वर उवाच
अथ चेन्मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते |  ५७   क
तत्र दीर्घाय़ुरुत्पन्नः स नरः सुखमेधते ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति