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वन पर्व
अध्याय १३२
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लोमश उवाच
यः कथ्यते मन्त्रविदग्र्यवुद्धि; रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् |  १   क
तस्याश्रमं पश्य नरेन्द्र पुण्यं; सदाफलैरुपपन्नं महीजैः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति