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वन पर्व
अध्याय १३२
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लोमश उवाच
ररक्ष सा चाप्यति तं सुमन्त्रं; जातोऽप्येवं न स शुश्राव विप्रः |  १५   क
उद्दालकं पितृवच्चापि मेने; अष्टावक्रो भ्रातृवच्छ्वेतकेतुम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति