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वन पर्व
अध्याय १३२
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लोमश उवाच
यत्तेनोक्तं दुरुक्तं तत्तदानीं; हृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् |  १७   क
गृहं गत्वा मातरं रोदमानः; पप्रच्छेदं क्व नु तातो ममेति ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति