वन पर्व  अध्याय १३२

लोमश उवाच

साक्षादत्र श्वेतकेतुर्ददर्श; सरस्वतीं मानुषदेहरूपाम् |  २   क
वेत्स्यामि वाणीमिति सम्प्रवृत्तां; सरस्वतीं श्वेतकेतुर्वभाषे ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति