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द्रोण पर्व
अध्याय १५०
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सञ्जय़ उवाच
तस्य विक्षिपतश्चापं रथे विष्टभ्य तिष्ठतः |  १८   क
अश्रूय़त धनुर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति