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वन पर्व
अध्याय १३२
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लोमश उवाच
उपालव्धः शिष्यमध्ये महर्षिः; स तं कोपादुदरस्थं शशाप |  ९   क
यस्मात्कुक्षौ वर्तमानो व्रवीषि; तस्माद्वक्रो भवितास्यष्टकृत्वः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति