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शान्ति पर्व
अध्याय ६१
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भीष्म उवाच
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च; धर्मस्तथार्थश्च रतिश्च दारे |  १४   क
निषेवितव्यानि सुखानि लोके; ह्यस्मिन्परे चैव मतं ममैतत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति