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द्रोण पर्व
अध्याय १०६
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सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गो भीमसेनो व्यरोचत |  ४७   क
तपनीय़निभैः पुष्पैः पलाश इव कानने ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति