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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
द्रुपदस्यात्मजान्दृष्ट्वा कुन्तिभोजसुतांस्तथा |  १   क
द्रोणपुत्रेण निहतान्राक्षसांश्च सहस्रशः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति