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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
ततो वृषरथो नाम भ्राता कर्णस्य विश्रुतः |  १८   क
जघान भीमं नाराचैस्तमप्यभ्यवधीद्वली ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति