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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
स तुद्यमानो नाराचैर्वृष्टिवेगैरिवर्षभः |  २१   क
जघान पञ्चभिर्वाणैः पञ्चैवातिवलो रथान् |  २१   ख
तान्दृष्ट्वा निहतान्वीरान्विचेलुर्नृपसत्तमाः ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति