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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते चास्त्रे भारद्वाजो युधिष्ठिरे |  २९   क
वारुणं याम्यमाग्नेय़ं त्वाष्ट्रं सावित्रमेव च |  २९   ख
चिक्षेप परमक्रुद्धो जिघांसुः पाण्डुनन्दनम् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति