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आदि पर्व
अध्याय ९५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शन्तनुर्नृपः |  १   क
तां कन्यां रूपसम्पन्नां स्वगृहे संन्यवेशय़त् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति