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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
सत्यां चिकीर्षमाणस्तु प्रतिज्ञां कुम्भसम्भवः |  ३१   क
प्रादुश्चक्रेऽस्त्रमैन्द्रं वै प्राजापत्यं च भारत |  ३१   ख
जिघांसुर्धर्मतनय़ं तव पुत्रहिते रतः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति