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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
ते हन्यमाना द्रोणेन पाञ्चालाः प्राद्रवन्भय़ात् |  ३८   क
पश्यतो भीमसेनस्य पार्थस्य च महात्मनः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति