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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धमतीव भय़वर्धनम् |  ४   क
त्वदीय़ानां परेषां च घोरं विजय़काङ्क्षिणाम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति