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द्रोण पर्व
अध्याय १३२
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सञ्जय़ उवाच
विव्याध दशभिस्तीक्ष्णैः शरैर्वज्रनिपातिभिः |  ७   क
शक्त्या चैनमथाहत्य पुनर्विव्याध सप्तभिः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति