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शान्ति पर्व
अध्याय १३०
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भीष्म उवाच
यथा मृगस्य विद्धस्य मृगव्याधः पदं नय़ेत् |  २०   क
कक्षे रुधिरपातेन तथा धर्मपदं नय़ेत् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति