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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
न धनानि न वासांसि न भोगान्न च काञ्चनम् |  १२   क
न गावो नान्नविकृतिं प्रय़च्छन्ति कदाचन ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति