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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
अपरे स्तम्भिनो नित्यं मानिनः पापतो रताः |  १७   क
आसनार्हस्य ये पीठं न प्रय़च्छन्त्यचेतसः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति