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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
अर्घार्हान्न च सत्कारैरर्चय़न्ति यथाविधि |  १९   क
अर्घ्यमाचमनीय़ं वा न यच्छन्त्यल्पवुद्धय़ः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति