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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
न स्तम्भी न च मानी यो देवताद्विजपूजकः |  २४   क
लोकपूज्यो नमस्कर्ता प्रश्रितो मधुरं वदन् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति