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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
सर्ववर्णप्रिय़करः सर्वभूतहितः सदा |  २५   क
अद्वेषी सुमुखः श्लक्ष्णः स्निग्धवाणीप्रदः सदा ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति