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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
उच्छैश्चाप्यवदन्रात्रौ नीचैस्तत्राग्निरज्वलत् |  ५४   क
पुत्राः पितॄनभ्यवदन्भार्याश्चाभ्यवदन्पतीन् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति