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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
सुखभागी निराय़ासो निरुद्वेगः सदा नरः |  ४२   क
एष देवि सतां मार्गो वाधा यत्र न विद्यते ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति