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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
वर्जय़न्त्यशुभं कर्म सेवमानाः शुभं तथा |  ४७   क
लभन्ते स्वर्गतिं नित्यमिह लोके सुखं तथा ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति