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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
स चेन्मानुषतां याति मेधावी तत्र जाय़ते |  ४८   क
श्रुतं प्रज्ञानुगं चास्य कल्याणमुपजाय़ते ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति