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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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भीष्म उवाच
जम्वुकस्य वचः श्रुत्वा कृपणं परिदेवतः |  २७   क
न्यवर्तन्त तदा सर्वे शवार्थं ते स्म मानुषाः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति