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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
ये तु मूढा दुराचारा विय़ोनौ मैथुने रताः |  ५१   क
पुरुषेषु सुदुष्प्रज्ञाः क्लीवत्वमुपय़ान्ति ते ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति