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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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महेश्वर उवाच
पशूंश्च ये वन्धय़न्ति ये चैव गुरुतल्पगाः |  ५२   क
प्रकीर्णमैथुना ये च क्लीवा जाय़न्ति ते नराः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति