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अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
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उमो उवाच
सावद्यं किं नु वै कर्म निरवद्यं तथैव च |  ५३   क
श्रेय़ः कुर्वन्नवाप्नोति मानवो देवसत्तम ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति