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वन पर्व
अध्याय १३३
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राजो उवाच
पन्था अय़ं तेऽद्य मय़ा निसृष्टो; येनेच्छसे तेन कामं व्रजस्व |  २   क
न पावको विद्यते वै लघीय़ा; निन्द्रोऽपि नित्यं नमते व्राह्मणानाम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति