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वन पर्व
अध्याय १३३
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अष्टावक्र उवाच
यज्ञं द्रष्टुं प्राप्तवन्तौ स्व तात; कौतूहलं नौ वलवद्वै विवृद्धम् |  ३   क
आवां प्राप्तावतिथी सम्प्रवेशं; काङ्क्षावहे द्वारपते तवाज्ञाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति