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वन पर्व
अध्याय १३३
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द्वारपाल उवाच
वन्देः समादेशकरा वय़ं स्म; निवोध वाक्यं च मय़ेर्यमाणम् |  ५   क
न वै वालाः प्रविशन्त्यत्र विप्रा; वृद्धा विद्वांसः प्रविशन्ति द्विजाग्र्याः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति