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वन पर्व
अध्याय १३३
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अष्टावक्र उवाच
शुश्रूषवश्चापि जितेन्द्रिय़ाश्च; ज्ञानागमे चापि गताः स्म निष्ठाम् |  ७   क
न वाल इत्यवमन्तव्यमाहु; र्वालोऽप्यग्निर्दहति स्पृश्यमानः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति