वन पर्व  अध्याय १३३

द्वारपाल उवाच

सरस्वतीमीरय़ वेदजुष्टा; मेकाक्षरां वहुरूपां विराजम् |  ८   क
अङ्गात्मानं समवेक्षस्व वालं; किं श्लाघसे दुर्लभा वादसिद्धिः ||  ८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति