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वन पर्व
अध्याय १३३
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अष्टावक्र उवाच
न ज्ञाय़ते काय़वृद्ध्या विवृद्धि; र्यथाष्ठीला शाल्मलेः सम्प्रवृद्धा |  ९   क
ह्रस्वोऽल्पकाय़ः फलितो विवृद्धो; यश्चाफलस्तस्य न वृद्धभावः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति