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उद्योग पर्व
अध्याय १३३
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मातो उवाच
आत्मानं वा परित्यज्य शत्रून्वा विनिपात्य वै |  १४   क
अतोऽन्येन प्रकारेण शान्तिरस्य कुतो भवेत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति