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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भृगुरु उवाच
आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् |  २३   क
तस्मिन्यः संश्रितो देहे ह्यव्विन्दुरिव पुष्करे ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति