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शान्ति पर्व
अध्याय ८२
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वासुदेव उवाच
स्यातां यस्याहुकाक्रूरौ किं नु दुःखतरं ततः |  १०   क
यस्य वापि न तौ स्यातां किं नु दुःखतरं ततः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति