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वन पर्व
अध्याय २७५
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मार्कण्डेय़ उवाच
लक्षय़ित्वेङ्गितं सर्वं प्रिय़ं तस्मै निवेद्य च |  ६०   क
वाय़ुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति