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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
यत्र ते वहवस्तात कुरवः पर्यवस्थिताः |  १७   क
सेनां दुरोदरं विद्धि शरानक्षान्विशां पते ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति