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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
वहुशः कत्थसे कर्ण कौरव्यस्य समीपतः |  १४   क
न तु ते विक्रमः कश्चिद्दृश्यते वलमेव वा ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति