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भीष्म पर्व
अध्याय ११२
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सञ्जय़ उवाच
ते तु भित्त्वा तव सुतं दुःशासनमय़ोमुखाः |  ११८   क
धरणीं विविशुः सर्वे वल्मीकमिव पन्नगाः |  ११८   ख
हय़ांश्चास्य ततो जघ्ने सारथिं च न्यपातय़त् ||  ११८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति