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शान्ति पर्व
अध्याय २५५
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जाजलिरु उवाच
अस्मिन्नेवात्मतीर्थे न पशवः प्राप्नुय़ुः सुखम् |  ३६   क
अथ स्वकर्मणा केन वाणिज प्राप्नुय़ात्सुखम् |  ३६   ख
शंस मे तन्महाप्राज्ञ भृशं वै श्रद्दधामि ते ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति