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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
यं भारं पुरुषो वोढुं मनसा हि व्यवस्यति |  २७   क
दैवमस्य ध्रुवं तत्र साहाय़्याय़ोपपद्यते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति