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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
ते समासाद्य सरितं पुण्यामोघवतीं नृप |  ३७   क
न्यवसन्नथ तां रात्रिं पाण्डवा हतशत्रवः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति