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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
अजय़्याश्च रणे पार्था देवैरपि सवासवैः |  ४६   क
सदैत्ययक्षगन्धर्वपिशाचोरगराक्षसैः |  ४६   ख
तथापि पार्थाञ्जेष्यामि शक्त्या वासवदत्तय़ा ||  ४६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति