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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
त्वं तु वृद्धश्च विप्रश्च अशक्तश्चापि संय़ुगे |  ५१   क
कृतस्नेहश्च पार्थेषु मोहान्मामवमन्यसे ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति